पृथ्वीराज चौहान पर निबंध हिंदी में

भारत के इतिहास के सबसे प्रसिद्ध राजाओं में पृथ्वीराज़ चौहान का नाम प्रमुख है। और Prithviraj chauhan की जीवनी पर टेलिविज़न प्रोगा्रम भी बन चुका है। इस Prithviraj chauhan serial में Pruthviraj chauhan के साहस, और उनकी कहानी पर बनाया गया था। जो उस समय टेलिविजन का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में एक था। ये कथा टेलिविज़न पर बहुत चर्चत हुआ, इस टेलिविज़न कथा के माध्यम से आसानी से पृथ्वीराज़ चौहान का इतिहास मालूम हुआ। Prithviraj Chauhan पर कार्यक्रम में episodes काफी लम्बा दिखाकर उनकी पूरी जीवनी दिखाने की कोशिश की गई।

पृथ्वीराज़ चौहान अज़मेर के राजा सोमेष्वर चौहान के बेटे थे, उन्का जन्म(Date of birth) 1165 में हुआ। बचपन से युद्ध और तमाम तरह के कौषल में Prithviraj Chauhan बहुत तेज़ और जल्दी सिखने, किसी भी बारिकियों को जान लेते थे। तेरह वर्ष की उर्मं  में उनके पिता की युद्ध मौत हुई, तभी से अजमेर के सिंहासन के उत्तराधिकारी बने, उनके नाना अनंगपाल ने अपनी वीरता और शौर्य के बारे में सुनकर दिल्ली की गद्दी को जीत लिया।

इतिहास में मुख्य रूप से हथियारों और युद्ध कला में निर्पूण Prithiviraj ने जब दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया, तो वहाॅं पर किला बनवाया जिसका नाम राइ पिथोरा रखा गया। उनका पूरा जीवन साहस, वीरता वह अपने नम्र वह अच्छे व्यवहार में लगा हुआ था।
उनका शत्रु जैचंद था, जब Prithviraj Chauhan अपना साम्राज्य में शांति की स्थापना के लिए प्रयास कर रहे थे, उसी दौराना मोहम्मद घोरी ने भारत में आक्रमण किया, 1191 इस पहले युद्ध में घोरी को हरा दिया गया। उसके अगले वर्ष यानी 1992 में फिर मोहम्मद घोरी ने 120000 की बड़ी सेना के साथ लाहोर आया, और उसने Prithviraj Chauhan का समर्पण माॅंगा, लेकिन पृथ्वीराज़ चैहान ने इसको मानने से इन्कार कर दिया।

 

Prithviraj Chauhan ने अपने राजपूत समुदाय के सहायता माॅंगी और 150 से अधिक राजपूत प्रमुखों ने उनका अुनरोध स्वीकार किया। अब Pruthviraj Chauhan के पास भी एक बहुत बड़ी और ताकतवर सेना थी, इसके साथ उनकी सेना में हाथियों को शामिल किया गया, एक हाथी कितनी तबाही कर सकता है, ये Prithvi Raj chauhan को पता था।

इस युद्ध का नाम तराइन इतिहास में दर्ज है, Prithviraj Chouhan की ताकतवर सेना का पता लगने पर सुल्तान मुहम्मद ने Muhammad ghazni को साथ देने लिए उससे मिल गया। और मोहम्मद घोरी को भी अब अपनी सेनीक ताकत में बल प्रतित हुआ, तो उसने फिर जिससे वह एक वर्ष पहले ही बुरी तरह हारा था, युद्ध के लिए तैयार हो गया। और फिर से उसने Prithviraj Chauhan के सामने एक प्रस्ताव रखा, या मुस्लान बने या वह हार जाये, और प्रस्ताव में अंतिम चेतावन लिखी।

लेकिन Prithviraj Chauhan वीर योद्धा था, वीर योद्धा अपना सर कटवा सकते हैं. अपनी प्रज़ा के लिए लेकिन कभी हार नहीं स्वीकार करता। घोरी ने हमले की अनुमती दे दी। और अपनी सेना को पाॅंच भागों में बांट कर राजपूत सैंनिकों पर हमला करवाया। राजपूत सैंनिकों ने अपने हाथियों का बनाया व्यूह आगे बढाया। लेकिन युद्ध करते-करते शाम हो गई।

 

राजपूतों की युद्ध परंपरा के अनुसार शाम को वे युद्ध नहीं लड़ते इसी का फायदा उठाकर घोरी ने युद्ध जारी रखा और राजपूत सेना पर हमला करके उनको हराया। इसके बाद क्या होना था। Prithviraj को बंदी बना कर अफगानिस्तान ले जाया गया, उनके साथ राजस्थान के लोकसंगीतज्ञ चांदभर को भी। Prithviraj और चांदभर का आपस में तालमेल अच्छा था, एक विषेशता पृथ्वीराज़ चोहान में ये थी, कि संगीत के धुन सुनकर निषाना लगाना।

क्या पृथ्वीराज वास्तव में मारे गए घोरी?: – मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को तीरंदाजी की कला दिखाने को कहा। इस खेल को और अधिक रोचक बनाने के लिए पृथ्वीराज की आखों में गर्म लोहे धातु डाली गई। चांदभर ने अपनी विषेश संगीत लाईनों पर पृथ्वीराज को बताया की घोरी अब कहा बैठा है और उनसे कितना दूर है, Prithviraj Chauhan ने कमान को पूरी ताकत के साथ अपने कान तक खिंचा और तीर से निषाना चांदभर के बताए जगह पर सांध दिया। घोरी ने आदेष दिया की निषाना लगाओं और उसी समय Prithviraj ने निशाना लगाया जो घोरी के ठीक गले में लगा, वार इतना तेज़ था की तीर गले से आर-पार हो गई। उसी समय घोरी की मौंत हो गई।

 

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु का कारण ने चीख कर कहा की मैंने मेरे अपमान का बदला ले लिया, वही पर मौजुद चाॅंद ने Prithviraj पर वार किया, पृथ्वीराज की आॅंखें ना होने के बावजुद एक वीर की तरह युद्ध किया और वीर की तरह वहाॅं अपनी अन्तीम साॅंस ली।➡ अगर आपके पास पृथ्वीराज चौहान के बारे में इसके अलवा और भी जानकारी है, तो आप कमेंट में बता सकते है। हम इस पोस्ट को समय-समय पर अॅपडेट करते रहेंगे। आप इस पोस्ट या 99हिन्दी को बुकमार्क कर सकते है।